क्या नया कानून किसानों की जेब पर चोट करेगा या उद्योगपतियों को लाभ देगा? यह सवाल उपभोक्ता मामले मंत्रालय द्वारा जारी मसौदे के बाद हर गन्ना उत्पादक के मन में उठ रहा है। 2 अप्रैल 2026 को जारी किए गए 'गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026' ने राजनीति और कृषि क्षेत्र में तूफान बुला दिया है। अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) ने इसे 'किसान-विरोधी' और 'कॉर्पोरेट समर्थक' करार देते हुए कड़ा विरोध दर्ज किया है।
बात सिर्फ़ कीमतों की नहीं है। किसानों का मानना है कि इस मसौदे से गन्ना क्षेत्र में राजस्व वितरण का संतुलन बिगड़ सकता है। वे चाहते हैं कि न केवल गन्ने का दाम ठीक हो, बल्कि चीनी और उसके सभी उप-उत्पादों से होने वाली आय में भी किसानों का हिस्सा हो। यही वह मोड़ है जहाँ सरकार और किसान एक-दूसरे से टकरा रहे हैं।
एफआरपी और सी₂ लागत: मुख्य विवाद
विवाद का केंद्र बिंदु है 'निष्पक्ष और मुनाफाखोर मूल्य' (एफआरपी - Fair and Remunerative Price)। अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) ने स्पष्ट मांग रखी है कि एफआरपी को "सी₂ लागत" से जोड़ा जाना चाहिए। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, प्रति क्विंटल ₹411 की सी₂ लागत को आधार माना जाना चाहिए।
लेकिन क्या यह काफी है? किसान संगठनों का तर्क है कि केवल मूल्य आधारित प्रणाली अपर्याप्त है। उनका कहना है, "गन्ने के खेत में किसान मेहनत करता है, लेकिन चीनी मिल में पैसा बनता है।" इसलिए, वे चाहते हैं कि चीनी, शीरा, बैगास और अन्य उप-उत्पादों से उत्पन्न राजस्व में किसानों की साझेदारी सुनिश्चित की जाए। अभी तक, अधिकांश लाभ मिल मालिकों के पास ही रह जाता है।
मुख्य मांगें क्या हैं?
- एफआरपी को सी₂ लागत (₹411 प्रति क्विंटल) से जोड़ना।
- सभी उप-उत्पादों पर राजस्व साझेदारी लागू करना।
- समय पर भुगतान सुनिश्चित करना और देरी पर सख्त दंड लगाना।
- कटौतियों पर नियंत्रण और थर्ड-पार्टी जांच की व्यवस्था।
- खांडसारी इकाइयों पर सख्त निगरानी।
- किसानों के बकाया को जब्त न किया जाए।
मेरठ और सहारनपुर से तेजतर्रार प्रतिक्रियाएं
विवाद सिर्फ़ पत्रकारिता तक सीमित नहीं रहा। मेरठ, उत्तर प्रदेश स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU) में आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में इस मुद्दे पर गर्मियों हुई। मुख्य वक्ता योगेंद्र यादव ने कहा, "गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 किसानों के आर्थिक हितों पर प्रहार है। सरकार भुगतान की अवधि बढ़ाकर किसानों को कर्ज के दलदल में धकेलना चाहती है।"
उनका आरोप था कि मसौदे में सुझाई गई ब्याज की गणना की विधि पारदर्शी नहीं है। "ये नियम चीनी मिलों को फायदा पहुंचाने और किसानों के हक को दबाने के लिए बनाए गए हैं," योगेंद्र यादव ने अपनी बात को और तीखा करते हुए कहा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस आदेश को वापस नहीं लिया, तो पूरे उत्तर प्रदेश में बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा।
इसी बीच, सहारांपुर, उत्तर प्रदेश में 21 मई 2026 को आयोजित कार्यकर्ता बैठक में भगत सिंह वर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष of पश्चिम प्रदेश मुक्ति मोर्चा और भाकियू वर्मा ने केंद्र सरकार पर गन्ना किसानों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
छोटे उद्योगों को खतरा?
हैरानी की बात यह है कि विरोध सिर्फ़ किसानों तक सीमित नहीं है। कुछ छोटे खांडसारी उद्योग भी असंतुष्ट हैं। भगत सिंह वर्मा ने बताया कि मसौदे के तहत नई चीनी मिलों की दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव है। "यह प्रस्ताव छोटे उद्योगों के लिए नुकसानदायक है," उन्होंने कहा। इसका मतलब है कि बड़ी कंपनियां अधिक क्षेत्र को कवर कर सकती हैं, जिससे छोटे खिलाड़ियों का जीना मुश्किल हो जाएगा।
भगत सिंह वर्मा ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में कई कड़े मांगें रखी हैं:
- गन्ने का नकद भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
- भुगतान में देरी होने पर 18 प्रतिशत ब्याज वसूला जाए।
- 'घटतौली' (वजन में कम करके धोखा) करने वाले मिल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई।
- प्रति क्विंटल एक किलो गन्ना कटौती बंद की जाए।
- एफआरपी और एसएपी व्यवस्था समाप्त कर गन्ने का मूल्य ₹700 प्रति क्विंटल नकद तय किया जाए।
- चीनी का दाम 60 रुपये प्रति किलो निर्धारित किया जाए।
अगले कदम और समय सीमा
सरकार ने इस मसौदे पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया प्राप्त करने की अंतिम तिथि 20 मई 2026 घोषित की है। एआईकेएस ने किसानों से अपील की है कि वे इस तारीख से पहले मंत्रालय को अपने सुझाव और आपत्तियां भेजें। बाजार में हालात तनावपूर्ण हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, तंग आपूर्ति की चिंताओं के बीच चीनी की कीमतें स्थिर रूझान पर कारोबार कर रही हैं, लेकिन भविष्य अनिश्चित है।
यदि सरकार ने किसानों की इन मांगों को स्वीकार नहीं किया, तो परिणाम भारी हो सकते हैं। "गांव-गांव विरोध प्रदर्शन" और "सड़कों पर जाम" जैसे कदम उठाए जाने की चेतावनी दी गई है। यह केवल एक कानूनी मसौदा नहीं, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा मामला है।
Frequently Asked Questions
गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
सबसे बड़ा विवाद एफआरपी (Fair and Remunerative Price) की गणना विधि और भुगतान की अवधि से जुड़ा है। किसान चाहते हैं कि एफआरपी को सी₂ लागत (₹411 प्रति क्विंटल) से जोड़ा जाए और उप-उत्पादों से होने वाले राजस्व में उनकी साझेदारी सुनिश्चित की जाए। इसके अलावा, नई मिलों की दूरी बढ़ाने का प्रस्ताव भी छोटे उद्योगों को प्रभावित कर सकता है।
भगत सिंह वर्मा ने प्रधानमंत्री को कौन सी मांगें भेजी हैं?
भगत सिंह वर्मा ने गन्ने का ₹700 प्रति क्विंटल नकद मूल्य और चीनी का ₹60 प्रति किलो मूल्य तय करने की मांग की है। उन्होंने भुगतान में देरी पर 18% ब्याज, घटतौली पर सख्त कार्रवाई और प्रति क्विंटल 1 किलो कटौती बंद करने की भी मांग की है।
क्या यह आदेश छोटे चीनी मिल मालिकों को भी प्रभावित करेगा?
हां, मसौदे में नई चीनी मिलों की अनुमति दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव है। विशेषज्ञों और किसान नेताओं का मानना है कि इससे बड़ी कंपनियों को अधिक क्षेत्र पर नियंत्रण मिलेगा, जिससे छोटे उद्योगों के लिए प्रतियोगिता मुश्किल हो जाएगी।
सरकार को प्रतिक्रिया देने की अंतिम तिथि क्या है?
उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने इस मसौदे पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया प्राप्त करने की अंतिम तिथि 20 मई 2026 निर्धारित की है। किसान संगठनों ने इस तारीख से पहले अपने सुझाव और आपत्तियां जमा करवाने की अपील की है।
अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) की मुख्य चिंता क्या है?
एआईकेएस की मुख्य चिंता यह है कि नया आदेश किसानों को कर्ज के दलदल में धकेल सकता है क्योंकि इसमें भुगतान की अवधि बढ़ाने और ब्याज की गणना की पारदर्शी विधि न होने का खतरा है। वे चाहते हैं कि किसानों को समय पर भुगतान मिले और उन्हें उप-उत्पादों के लाभ का हिस्सादार बनाया जाए।