शराब घोटाला: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से केस हटाने की मांग पर अड़े केजरीवाल

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शराब घोटाला: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से केस हटाने की मांग पर अड़े केजरीवाल

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल, पूर्व मुख्यमंत्री ने एक बार फिर कानूनी मोर्चे पर अपनी आक्रामक रणनीति बदल ली है। 5 अप्रैल, 2026 को केजरीवाल और उनके चार अन्य साथियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक आवेदन दाखिल कर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से मांग की है कि वे इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लें (recusal plea)। यह पूरा मामला दिल्ली की बहुचर्चित शराब नीति घोटाले से जुड़ा है, जिसमें निचली अदालत ने पहले ही सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अब सवाल यह है कि क्या कोर्ट इस मांग को स्वीकार करेगा या केजरीवाल को एक और कानूनी झटका लगेगा?

बात दरअसल यह है कि यह मामला अब एक दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। निचली अदालत ने जब केजरीवाल और उनके साथियों को बरी किया था, तो जज ने जांच एजेंसियों के काम करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए थे। इसी फैसले से नाराज होकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने हाईकोर्ट में अपील की। अब वही अपील जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के सामने है, लेकिन केजरीवाल का मानना है कि इस मामले की निष्पक्ष सुनवाई के लिए जज का बदलना जरूरी है।

अदालत में व्यक्तिगत पेशी और सीबीआई का पलटवार

6 अप्रैल, 2026 को जब यह मामला कोर्ट पहुंचा, तो नजारा काफी नाटकीय था। केजरीवाल ने फैसला किया कि वे वकील के जरिए नहीं, बल्कि खुद अपनी दलीलें पेश करेंगे। उन्होंने कोर्ट को बताया कि चूंकि वे एक 'लिटिगेंट इन पर्सन' (स्वयं पैरवी करने वाले) के तौर पर पेश हो रहे हैं, इसलिए वे इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग (e-filing) नहीं कर सके और उन्होंने मैन्युअल तरीके से आवेदन दिया।

लेकिन सीबीआई ने इस पैंतरे को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं किया। सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि केजरीवाल ने अब तक एक वकील नियुक्त किया हुआ है और उस वकील को केस से हटाया नहीं गया है। सॉलिसिटर जनरल ने तंज कसते हुए कहा, "अगर वह खुद पेश होना चाहते हैं, तो उनके वकील का वहां होना बेमानी है। उन्हें तय करना होगा कि वे वकील के जरिए लड़ेंगे या खुद।"

इस बीच, कोर्ट ने केजरीवाल की इस अर्जी पर सीबीआई को नोटिस जारी कर दिया है। यानी अब यह तय होगा कि क्या जस्टिस शर्मा इस केस को जारी रखेंगी या इसे किसी और बेंच को सौंपा जाएगा।

सिर्फ एक अर्जी नहीं, बल्कि एक लंबी कानूनी जंग

अगर आप गौर करें, तो यह पहली बार नहीं है जब केजरीवाल ने जज बदलने की कोशिश की है। इससे पहले उन्होंने डी.के. उपाध्याय, जो दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हैं, को एक पत्र लिखकर मामला ट्रांसफर करने की गुहार लगाई थी। लेकिन उस समय यह कहकर इनकार कर दिया गया कि जज के हटने का फैसला खुद संबंधित जज को ही लेना होता है। हार नहीं मानते हुए, केजरीवाल ने अनुच्छेद 32 के तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया था।

यह सब तब हो रहा है जब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने एक पिछली सुनवाई के दौरान संकेत दिया था कि निचली अदालत के कुछ निष्कर्षों पर फिर से विचार करने की जरूरत है। साथ ही, उन्होंने जांच अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिशों पर रोक भी लगा दी थी। यही वह बिंदु है जहां केजरीवाल और उनकी टीम को लगा कि मामला उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं जा रहा है।

मामले के मुख्य किरदार और उनकी भूमिका

इस कानूनी लड़ाई में केजरीवाल अकेले नहीं हैं। उनके साथ अन्य प्रमुख नेता भी इस 'रिक्यूजल याचिका' में शामिल हैं:

  • मनीष सिसोदिया: पूर्व उपमुख्यमंत्री, जो इस घोटाले के शुरुआती आरोपों के केंद्र में थे।
  • दुर्गेश पाठक: पूर्व विधायक और पार्टी के वरिष्ठ नेता।
  • विजय नायर: जिन्हें इस केस में अहम कड़ी माना गया है।
  • अरुण रामचंद्रन पिल्लै: अन्य आरोपी जिन्होंने सामूहिक रूप से यह आवेदन दिया।

इन सभी का तर्क यह है कि यदि उन्हें निष्पक्ष न्याय मिलना है, तो सुनवाई करने वाली बेंच में किसी भी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जज से खुद को अलग करने की मांग करना एक बड़ा कदम है और इसके लिए बहुत ठोस आधार की जरूरत होती है।

आगे क्या होगा? विश्लेषण और प्रभाव

अब पूरी नजरें 6 अप्रैल की अगली कार्यवाहियों पर हैं। यह मामला सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि दिल्ली की राजनीति का भविष्य भी तय कर सकता है। अगर सीबीआई की अपील स्वीकार हो जाती है और निचली अदालत का बरी करने वाला फैसला पलट जाता है, तो केजरीवाल और उनके साथियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि केजरीवाल का खुद कोर्ट में खड़े होकर दलीलें देना यह दिखाता है कि वे अब इस मामले को सिर्फ वकीलों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते। वे सीधे जज के सामने अपनी बात रखकर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या यह रणनीति काम करेगी? यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल दिल्ली की कानूनी गलियारों में इसी चर्चा है कि क्या जस्टिस शर्मा खुद को अलग करेंगी या केजरीवाल की इस याचिका को खारिज कर देंगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

रिक्यूजल याचिका (Recusal Plea) क्या होती है?

रिक्यूजल याचिका एक कानूनी आवेदन होता है जिसमें किसी पक्ष द्वारा यह अनुरोध किया जाता है कि न्यायाधीश को उस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए। ऐसा तब किया जाता है जब याचिकाकर्ता को लगता है कि जज निष्पक्ष नहीं रह पाएंगे या जज का उस मामले या व्यक्ति से कोई पुराना संबंध हो सकता है।

केजरीवाल ने खुद दलीलें पेश करने का फैसला क्यों किया?

अरविंद केजरीवाल ने 'प्रो बोनो' या व्यक्तिगत पैरवी का रास्ता चुना ताकि वे अपनी बात सीधे अदालत के सामने रख सकें। उन्होंने तर्क दिया कि ई-फाइलिंग की तकनीकी समस्याओं के कारण उन्होंने मैन्युअल आवेदन दिया, लेकिन सीबीआई का मानना है कि यह केवल एक कानूनी दांवपेच है क्योंकि उन्होंने पहले से ही वकील नियुक्त कर रखे हैं।

इस मामले में सीबीआई और निचली अदालत के बीच क्या विवाद है?

निचली अदालत ने जांच एजेंसियों (CBI/ED) के काम करने के तरीके को गलत बताते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। सीबीआई इस फैसले से सहमत नहीं है और उसने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी है। अब हाईकोर्ट यह तय करेगा कि निचली अदालत का फैसला सही था या सीबीआई की जांच में दम है।

क्या जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा केस छोड़ देंगी?

यह पूरी तरह से जस्टिस शर्मा के विवेक और कोर्ट की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। आमतौर पर जज तभी अलग होते हैं जब उन्हें लगे कि उनकी मौजूदगी से न्याय की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। फिलहाल कोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी किया है और जल्द ही इस पर फैसला लिया जाएगा।

इस केस में अन्य कौन-कौन से नेता शामिल हैं?

केजरीवाल के अलावा मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक, विजय नायर और अरुण रामचंद्रन पिल्लै इस कानूनी लड़ाई में साथ हैं। इन सभी ने सामूहिक रूप से जस्टिस शर्मा से खुद को अलग करने की मांग की है ताकि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई मिल सके।

Savio D'Souza

लेखक के बारे में Savio D'Souza

मैं एक पत्रकार हूँ और भारतीय दैनिक समाचारों पर लिखने का काम करता हूँ। मैं राजनीति, सामाजिक मुद्दे, और आर्थिक घटनाक्रम पर विशेष ध्यान देता हूँ। अपने लेखन के माध्यम से, मैं समाज में जागरूकता बढ़ाने और सूचनात्मक संवाद को प्रेरित करने का प्रयास करता हूँ।

टिप्पणि (14)
  • Senthilkumar Vedagiri
    Senthilkumar Vedagiri
    11.04.2026

    Sab set h bhai... ye sab sirf ek natak hai
    Sarkar ne pehle se hi decide kr liya hoga ki kon sa judge rahega aur kon jayega. Hume lagta hai hum news prh rahe h pr asli game toh parde ke piche chalta h. Ye recusal plea toh bas time pass krne ka tarika h taaki public ko lage ki ladayi chal rhi h. System hi aisa h ki bade log hamesha bach jate h aur hum bas popcorn kha kr dekhte h lol

  • saravanan saran
    saravanan saran
    12.04.2026

    न्याय की तलाश हमेशा लंबी होती है और इसमें समय लगता है। यह देखना दिलचस्प है कि कैसे राजनीति और कानून एक दूसरे में उलझे हुए हैं।

  • SAURABH PATHAK
    SAURABH PATHAK
    13.04.2026

    भाई देखो, ये सब पुरानी ट्रिक है। जब केस कमजोर होता है तो जज बदलने की मांग की जाती है। केजरीवाल को पता है कि कानूनी रूप से वो फंस चुके हैं, इसलिए अब ये नया ड्रामा शुरू किया है। ई-फाइलिंग का बहाना तो एकदम बचकाना है, आज के जमाने में कोई भी कह दे कि उसे ई-फाइलिंग नहीं आती, खासकर वो बंदा जो पूरा देश चला चुका हो। सीधी बात है, वो बस माहौल बनाना चाहते हैं ताकि उनके समर्थक कहें कि उनके साथ अन्याय हो रहा है।

  • Arun Prasath
    Arun Prasath
    14.04.2026

    कानूनी दृष्टिकोण से, रिक्यूजल याचिका तभी प्रभावी होती है जब कोई ठोस पूर्वाग्रह साबित किया जा सके। यदि पिछले आदेशों के आधार पर जज को हटाने की मांग की जा रही है, तो इसकी संभावना कम है कि अदालत इसे स्वीकार करे।

  • Priya Menon
    Priya Menon
    14.04.2026

    यह पूरी तरह से हास्यास्पद है कि एक व्यक्ति जो खुद को कानून का रक्षक बताता है, वह अब जज की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। क्या यह लोकतंत्र की गरिमा के अनुकूल है कि हम हर बार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलने की मांग करें? यह केवल समय की बर्बादी है और अदालत के साथ खिलवाड़ है।

  • Nikita Roy
    Nikita Roy
    15.04.2026

    सब ठीक हो जाएगा बस सच की जीत होनी चाहिए

  • Jivika Mahal
    Jivika Mahal
    17.04.2026

    अरे यार, ये सब तो चलता रहता है पॉलिटिक्स में! वैसे मुझे लगता है कि उन्हें थोड़ा और धैर्य रखना चाहिए था। कानून की प्रक्रिया थोड़ी धीमी होती है पर सही दिशा में जाती है, बस हमें उम्मीद रखनी चाहिए कि सब कुछ पारदर्शी तरीके से होगा।

  • Kartik Shetty
    Kartik Shetty
    18.04.2026

    साधारण लोगों को लगता है कि यह कोई बड़ी लड़ाई है पर असल में यह बस कानूनी बारीकियों का खेल है जो सिर्फ कुछ खास लोगों को समझ आता है

  • Anu Taneja
    Anu Taneja
    19.04.2026

    उम्मीद है कि निष्पक्ष सुनवाई होगी।

  • vipul gangwar
    vipul gangwar
    20.04.2026

    देखिये, दोनों तरफ के तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं। सीबीआई अपनी जांच पर भरोसा कर रही है और दूसरी तरफ केजरीवाल को अपनी निष्पक्षता का डर है। शायद बीच का कोई रास्ता निकले जिससे न्याय मिले और किसी के साथ अन्याय न हो। हम सब बस यही चाहते हैं कि सच सामने आए।

  • Sharath Narla
    Sharath Narla
    21.04.2026

    वाह, क्या कमाल का ड्रामा है! पहले वकील रखो, फिर कहो कि मैं खुद लड़ूंगा, और फिर कहो कि जज साहब को हटा दो। ये तो किसी नेटफ्लिक्स सीरीज से कम नहीं है। न्याय का मंदिर अब एंटरटेनमेंट जोन बन गया है। बहुत बढ़िया!

  • Anil Kapoor
    Anil Kapoor
    23.04.2026

    यह सब बकवास है। जो लोग कानून की समझ रखते हैं वे जानते हैं कि रिक्यूजल की मांग करना अक्सर एक डिफेंस मैकेनिज्म होता है। जब आपको लगता है कि आप केस हार रहे हैं, तो आप जज को दोष देना शुरू कर देते हैं। यह कोई नई बात नहीं है और न ही इसमें कुछ खास है। बस शोर मचाया जा रहा है।

  • Pradeep Maurya
    Pradeep Maurya
    24.04.2026

    भारत की न्याय प्रणाली दुनिया की सबसे जटिल प्रणालियों में से एक है और जब इसमें राजनीति का तड़का लगता है तो आम जनता को लगता है कि न्याय केवल अमीरों और ताकतवरों के लिए है। यह शराब घोटाला सिर्फ पैसों का मामला नहीं है बल्कि यह हमारे प्रशासनिक ढांचे की विफलता को भी दर्शाता है। केजरीवाल का खुद पैरवी करना एक साहसी कदम हो सकता है, लेकिन क्या यह वास्तव में कानूनी रूप से उनके पक्ष को मजबूत करेगा या यह केवल एक राजनीतिक स्टंट है जिसे जनता के सामने पेश किया जा रहा है ताकि उनकी छवि एक 'लड़ाकू' नेता की बनी रहे? हमें यह समझना होगा कि कानून सबूतों पर चलता है, भावनाओं पर नहीं।

  • megha iyer
    megha iyer
    26.04.2026

    ये सब बहुत ही अजीब है। मुझे समझ नहीं आता लोग इतने पैसे क्यों खर्च करते इन केसों में। बस खत्म करो इसे।

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